ईरान में जैसे ही राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए और अहमदीनिजाद के दोबारा राष्ट्रपति बनने की खबर फैली, तेहरान की सड़कों पर दंगे शुरू हो गए। युवा लड़के-लड़कियां हाथों में अहमदीनिजाद से चुनाव में हारे उम्मीदवार, मीर हुसैन मूसावी की तस्वीरें और झंडे लेकर तेहरान के सबसे पॉश इलाके और राजनीतिक जुलूसों के गढ़ वली-अस्र स्क्वॉयर पहुंच गए।
10 जून से पहले तक, चारों तरफ से बड़ी-बड़ी डिजिटल स्क्रीन्स से घिरा, रोशनी और रौनक से चमचमाता, यही वली-अस्र स्क्वॉयर अधिकतर मूसावी समर्थित नारों से गूंजा करता था और कभी-कभी अहमदीनिजाद के समर्थकों से भिड़ने का अड्डा भी बनता था।
चुनाव के लिए खास तौर से तैयार किए गए जिंगल्स और उन पर जबरदस्त नाच, सड़क के बीचों-बीच एक राजनीतिक डिस्कोथेक जैसा समां बांध देता था। मेरे जैसे विदेशी पत्रकार के लिए भी ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि लगभग पूरे पॉश नोर्थ तेहरान ने मूसावी के लिए मतदान किया होगा। तो क्या यही वजह है कि मूसावी की हार ने तेहरान की सड़कों पर हो रहे लोकतंत्र के इस जश्न को इन्हीं सड़कों पर मातम में बदल दिया।
इस विरोध की आग को समझने के लिए 10 साल पहले के ईरान को समझना होगा। इससे एक दशक पहले भी ईरान इसी तरह जल रहा था। जुलाई, 1999 में हुए प्रदर्शन इससे कहीं ज्यादा बड़े और हिंसक थे और उसकी आग ने सिर्फ तेहरान ही नहीं, ईरान के हर छोटे-बड़े शहर को अपनी चपेट में ले लिया था। उन प्रदर्शनों के केंद्र में ईरानी छात्र थे और वजह राष्ट्रपति (इस चुनाव में मूसावी के समर्थन में अपनी उम्मीदवारी वापस ले चुके यही मोहम्मद खातमी, 1999 में ईरान के राष्ट्रपति थे) का विरोध नहीं, उनका समर्थन था।
दरअसल, धार्मिक नेताओं की अदालत ने, उनके विरोध की कलम को आवाज देने वाले अकेले अखबार सलाम को बंद कर दिया गया था। और फिर धार्मिक नेताओं ने ऐसा सितम ढाया कि कई छात्र मारे गए, बहुत से जख्मी हुए, कुछ तो हमेशा के लिए लापता हो गए। उस दौरान विरोध के अपराधी छात्र दस साल बाद आज भी ईरान की जेलों में सजा काट रहे हैं।
हालांकि तब और अब के विरोध के पीछे कारण काफी अलग हैं, लेकिन इस और उस दौर के विरोध के केंद्र में एक ही विचारधारा है - सुधारवादी और एक ही व्यक्ति भी - मोहम्मद खातमी - यही खातमी हैं, जिनके समर्थन से मूसावी का कद इतना बढ़ा कि अहमीनिजाद के मुकाबले उनकी जीत की परिभाषएं लिखी जाने लगीं। दुनिया हैरान है कि जब ईरानी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं तो अहमदीनिजाद को किसने जिताया?
दरअसल इसकी जड़ में दो ईरानों की खाईयां हैं, पश्चिम से प्रभावित, 21वीं सदी का शहरी, आधुनिक ईरान, दूसरी तरफ अपनी तहजीब और धर्म पर नाज करता गांवों में बसा पारंपरिक फारसी ईरान। तेहरान की सड़कों पर हो रही जंग इन खाइयों को और चौड़ा कर रही है।
एक तरफ नॉर्थ तेहरान के पॉश इलाकों में रहने वाला, फाइव स्टार होटलों में जाने वाला, ग्लोबल ईरानी है, जो एक अमेरिकी सपना संजोए रहता है। अहमदीनिजाद जब-जब पश्चिम विरोधी बयान देते हैं, इस ईरानी का अमेरिकी सपना उससे और दूर चला जाता है, वह अहमदीनिजाद से और चिढ़ जाता है। दूसरा ईरानी गांवों-कस्बों में बसा, खेती या छोटी-मोटी नौकरी करके अपना गुजारा करता है, सिर्फ इस बात से खुश होता है कि वह ईरानी है।
इस बात पर नाज करता है कि उसका देश ऐसा है जो अमेरिका की गुलामी नहीं करता। जब-जब अहमदीनिजाद अमेरिका को ललकारते हैं, उसके दिल को ठंडक पहुंचती है। एक ईरानी लड़की जबरदस्ती का कानूनी स्कार्फ पहनती है तो दूसरी हया से अपना सरापा चादर में लपेटे रहती है। एक ईरानी जेनीफर लोपेज के गानों पर थिरकता है तो दूसरा रूमी को पढ़कर मस्त होता है।
गरीब ईरान ने अमीर ईरान को हरा दिया है। तेहरान का २क् फीसद, गांवों के 80 फीसद ईरानियों के सामने परास्त हुआ है। ईरान की सड़कों पर दो उम्मीदवारों की तस्वीरों के साथ दरअसल, दो ईरान लड़ रहे हैं। लेकिन इस जीत के पीछे एक बेहद खास वजह को भूलकर भी नहीं भुलाया जा सकता। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामनई अहमदीनिजाद को पसंद करते हैं।
अपने पद की गरिमा उन्हें साफ तौर पर अहमदीनिजाद का समर्थन करने से रोकती है, लेकिन कई बार इशारों-इशारों में उन्होंने ईरानी लोगों को अपनी पसंद के बारे में बता दिया। हालांकि खामनई का वो जलवा तो नहीं जो 1979 या उसके बाद के सालों तक अयातुल्लाह खुमैनी का था, लेकिन फिर भी ईरानियों का बड़ा तबका उनकी बात को आकाशवाणी समझता है।
ये ईरान की विडंबना ही है कि खातमी जैसे दाढ़ी और पगड़ी वाले धार्मिक नेता मोड्रेट हो गए हैं और अहमदीनिजाद जैसा धार्मिक पृष्ठभूमि न रखने वाला, बिना दाढ़ी वाला इंसान कट्टरपंथी कहलाया जा रहा है।
ईरानियों का ये फैसला सिर्फ ईरानी नेताओं के लिए नहीं अमेरिका के लिए भी एक संदेश है। अहमदीनिजाद ने जिस खूबसूरती और चालाकी के साथ न्यूक्लियर प्रोग्राम को सीधे राष्ट्रीय गर्व से जोड़ दिया है, ईरान के साथ बातचीत की मेज पर बैठते वक्त अमेरिका को इस गांव वाले, गरीब ईरान की भावनाओं को जरूर ध्यान में रखना होगा।
(लेखिका पत्रकार हैं और हाल ही में ईरान दौरे से लौटी हैं)
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